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Krishna

Saturday, October 17, 2020

3 बहाने जो असफल बनाती है

3 बहाने जो हमें सफल नहीं होने देती (3 Common causes that make people unsuccessful) 

इस बात  को परिभाषित करना बहुत ही कठिन है कि सफल कौन है और असफल कौन? यानि सफलता कि परिभाषा क्या है और कौन सफल है? आपको शायद पता हो जिन्हें हम और आप असफल मानते है, उनमें से बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने आप को असफल नहीं मानते। फिर भी बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो अपनी असफलता को स्वीकार करते हैं। 

बहाने जो असफल बनाती है

जिसने अपनी असफलता को स्वीकार कर लिया निश्चित रूप से फिर वो इसके कारणो को ढूँढता है। चार दोस्त है, कोई ज्यादा सफल हो जाता है, कोई थोड़ा, उनमे से कोई ऐसा भी है जो असफल हो जाता है। आखिर कोई तो कारण होगा? 

बहुत से कारण हो सकते हैं असफलता के। जरूरी नहीं सारे कारण किसी एक व्यक्ति के साथ हो। असफल होने के लिए कोई एक कारण ही काफी होता है। उस कारणों को बताएगा कौन और स्वीकार कौन करता है? जी हाँ सही कहा मैंने। किसी कि असफलता के पीछे बहुत सारे कारण हो सकते हैं। उनमें से सबसे प्रमुख कारण है:

असफलता को स्वीकार न करना 

जैसे मोटापा कई बीमारियों की जड़ है वैसे ही अपनी असफलता को स्वीकार न करना किसी व्यक्ति के असफल होने के लिए काफी है। जब आप स्वीकार करेंगे आप बीमार हैं तभी तो डॉक्टर के पास जाएँगे। जब स्वीकार ही नहीं करेंगे फिर डॉक्टर के पास क्यों जाना। 

आज से तीस साल पहले मेरी एक व्यक्ति से बात हुई। मै उस समय पढ़ाई ही कर रहा था। मैंने उस व्यक्ति को पूछा "आप क्या करते हैं?" 

उनका जबाव था "शिक्षक हूँ"।

मैंने पूछा " कहाँ ?"

उन्होने एक संस्कृत स्कूल का नाम बताया। मैं उस स्कूल के बारे में जानता था। वो स्कूल वर्षो पहले बना था। न ही सरकार से मान्यता प्राप्त थी और न ही स्कूल में एक भी बच्चे पढ़ते थे। चुकी स्कूल को बने हुए काफी वर्ष बीत  चुके थे, परिणाम स्वरूप उस स्कूल के बहुत से शिक्षक जिन्हें अपने बच्चों को पालने  कि चिंता थी और वास्तविकता को स्वीकार करते थे दिल्ली - मुंबई जैसे शहरों में जाकर नौकरी कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं।  आज के समय में अब उस स्कूल का अवशेष भी शेष न रहा। 

लिहाजा मैंने उस व्यक्ति से कहा "फिर तो आप बेरोजगार हैं क्योकि कोई सैलरी तो आपको मिलती नहीं और न ही स्कूल में कोई काम है? 


मेरा उनको बेरोजगार कहना बहुत ही नागबार गुजरा था। मेरे ऊपर वो क्रोधित हो गए थे और मेरे प्रश्न को अज्ञानता समझकर मेरे से बात करने से मना कर दिया था। वो व्यक्ति आज भी अपने पिता के छोड़े हुये संपति का उपभोग करते हुए जीवन-यापन कर रहे हैं। 

यहाँ उस व्यक्ति के बारे में यह कहना गलत होगा कि इनके पास कोई बहाना है या इनको असफल कहना भी शायद गलत होगा। क्योंकि यहाँ कोई लक्ष्य ही नहीं है। जब लक्ष्य न हो फिर achievement कैसा? यहाँ मैंने इस व्यक्ति कि चर्चा इसलिए की है क्योंकि स्वयं के दृष्टिकोण से भले ही वो व्यक्ति सफल हो लेकिन सामाजिक दृष्टि से जरूर असफल हैं। 

मेरे साथ पढ़ने वाला मेरा भी एक मित्र पढ़ाई के बाद गाँव मे ही रह गया। शुरुआती कुछ दिनों तक पिताजी के पेंशन पर जीवन-यापन करता रहा बाद में अपने पुरखों कि संपति बेचकर गुजारा कर रहा है। समय - समय पर सरकार से मिलने वाले अनुदान का फायदा उठाता रहता है। इसके अलावा कोई टोपी घुमाकर कुछ कमा ले कह नहीं सकते। अपनी ज़िंदगी से खुश है। कोई गिला- शिकवा नहीं। इसको भी शायद असफल कहना गलत होगा, क्योंकि कोई लक्ष्य नहीं है। 

दिक्कत वहाँ होती है जब आप कोई लक्ष्य तो निर्धारित करते हैं, लेकिन उस लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते। लक्ष्य तक न पहुँच पाना कोई अनहोनी नहीं है। ऐसा बहुतों के साथ होता है। आप लक्ष्य तक नहीं पहुच सके इस बात को स्वीकार करना बड़ी बात है। जहाँ बहुत से लोग स्वीकार करने से पीछे हट जाते हैं।

ज्यादातर लोग जो अपने लक्ष्य को पाने में असफल होते है वो ये नहीं चाहते कि लोग ये समझे कि मैं असफल हूँ। भले ही वो ये स्वीकार भी कर ले कि वो असफल हो गया तो वो ये स्वीकार नहीं करता कि इसमें उसकी कोई गलती थी। इसके लिए वो तरह-तरह की परिस्थितियों को दोष देता है। 

एक लक्ष्य को पाने में असफल होना ज़िंदगी में असफल होना नहीं है। जिसने अपनी गलतियों को स्वीकार किया वो फिर दूसरे तरीके से एक अलग लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ते हैं। चुकी पहले के गलतियों को स्वीकार किया इसलिए दुबारा उस गलती को नहीं करेगा और निश्चित रूप से सफलता कि संभावना बढ़ जाती है। 

अपनी गलती स्वीकार नहीं करेंगे, सौ काम कर लो हाथ वही आएगा।     

मै एकबार ज़ी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा को सुन रहा था। उनको किसी ने पूछा "आप किसी काम में असफल हुए हैं।"

उनका जबाव था "मैंने जितने काम शुरू किये उससे ज्यादा बंद किये"

तात्पर्य शुरुआती चरण में गलतियाँ करना आम बात है, बड़ी बात है उसको स्वीकार करना। आज शुभाष चन्द्रा कि गिनती देश के जाने-माने उद्योगपतियों  में होती है।

मैं भी स्वीकार करता हूँ कि मैं अपने जीवन के पहले चरण में असफल हो गया। चुकी अपनी गलतियों को स्वीकार किया इसलिए आज आंशिक सफल हूँ।  

परिस्थिति मेरे अनुकूल नहीं हैं। 

परिस्थिति एक बहुत बड़ा factor है किसी कि सफलता और असफलता के पीछे। परिस्थिति अनुकूल और प्रतिकूल होने के पीछे कई factors हो सकते है। जैसे:

  • आर्थिक स्थिति 
  • पारिवारिक पृष्टभूमि 
  • व्यक्तिगत हुनर 
  • इच्छाशक्ति, 

इसके अलावा भी कई कारण हो सकते है  जो परिस्थिति को अनुकूल या प्रतिकूल बनाते है।


इसमें कोई दो राय नहीं कि परिस्थिति अनुकूल हो तो सफलता पाने में आसानी होती है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि प्रतिकूल को अनुकूल न बनाया जा सके। 

आपने वो फिल्म देखी है ? "Dashrath Manjhi  The Mountain Man" पहाड़ पर रहने वाला एक गरीब आदमी कैसे अपने दृढ़ इच्छा शक्ति के बलपर, अकेले वर्षो कि मेहनत से पहाड़ से रास्ता बना देता है। उसने किसी परिस्थिति को नहीं कोसा न ही किसी से किसी तरह कि साहायता कि आशा की। अपने दृढ़ इच्छाशक्ति के बलपर एक असंभव काम को संभव कर दिया। 

उस फिल्म का एक संवाद मुझे बहुत पसंद है (हम क्यों भगवान के भरोसे बैठें, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो"।   

किसी ने सच ही तो कहा है (कौन कहता है आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तवियत से उछालो  यारों"। 

स्वादिष्ट खाने का मजा तभी मिलता है जब ज़ोरों की भूख लगी हो। वैसे ही सफलता का मजा तभी है जब प्रतिकूल परिस्थिति में रहकर सफलता पायी जाए। सबकुछ अनुकूल हो फिर वो सफलता नहीं विरासत में मिली हुई संपति है।  विरासत को संभाल कर  रखना भी सबके लिए संभव नहीं होता । उसके लिए भी हुनर चाहिये। 

हर काम में कमी निकालना 

रजनीश ने अपने एक प्रवचन में कहा था "दुनिया में सबसे आसान काम है किसी को गलत या सही साबित करना।"  इसके लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर किसी चीज़ को गलत साबित करना है तो उसकी दस कमियाँ निकाल दो, अगर सही साबित करना है तो दस फायदे गिना  दो।

इसको सही से समझने के लिए टेलीविज़न पर चलने वाले political debate को देख सकते है। 

कुछ लोगों में आदत होती है हर काम मे कमी निकालना। इसमें कोई दो राय नहीं की किसी काम को करने से पहले उसमें आनेवाले risk factors को देखा जाता है। दिक्कत तब आती है जब केवल risk factors ही नजर आये। एक वक्त ऐसा भी आता है जब ऐसे लोग काम में कमी निकालते -निकालते निकम्मों की श्रेणी में आ जाते हैं।

ये सबकुछ निर्भर करता है आपके देखने के नज़रिए पर। इसको हम एक- आध उदाहरण से समझ सकते है: 

half filled glass

 अब इस गिलास के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? आधा खाली है या आधा भरा है। बात छोटी सी है। आपका जो भी जबाव होगा वो आपके सोच को दर्शाता है। 

नदी में इसलिए नहीं उतरते की कहीं डूबकर मौत न हो जाए। लेकिन घर के अंदर बैठे-बैठे heart attack से मौत हो जाए उसका क्या करेंगे?

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उपसंहार 

जाने-माने motivator शिव खेड़ा ने अपने किताब "जीत आपकी" में एक जगह लिखा है "सफल लोग कोई अलग काम नहीं करते, वो अलग तरीके से काम करते हैं।" 

अगर कोई लक्ष्य न हो फिर तो सब बहाने चलेंगे , लेकिन  अगर  कोई लक्ष्य पाल रखा है फिर........... 

याद है  हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति  डॉ. अब्दुल कलाम का वो विचार  "अगर सूरज की तरह चमकना है तो सूरज की तरह जलना  पड़ेगा"। 

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